हर साल एक दिन… और बाकी पूरे साल?
हर साल 8 मार्च को दुनिया Women’s Day मनाती है। सोशल मीडिया पर “नारी शक्ति”, “सम्मान”, “सशक्तिकरण” जैसे शब्दों की भरमार हो जाती है। स्टेटस, पोस्ट, फूल और शुभकामनाएँ — सब कुछ अचानक बहुत ज़ोरों से दिखाई देने लगता है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सम्मान सिर्फ एक दिन का उत्सव है?
क्या सच में उस एक दिन की तारीफ और तालियाँ उन अनगिनत दिनों की खामोशी को भर सकती हैं, जब समाज अक्सर महिलाओं की आवाज़ को सुनना ही नहीं चाहता?
यह कविता उसी विरोधाभास को महसूस करने की कोशिश है — उस दिखावे और सच्चाई के बीच की दूरी को शब्द देने की एक छोटी सी कोशिश।

कैलेंडर की एक तारीख पे ये कैसा शोर मचा,
कल जो अनदेखी थी उस पर आज क्यों ज़ोर मचा।
स्टेटस में “शक्ति”, “नारी” की बड़ी-बड़ी बातें हैं,
घर के सूने कमरों में फिर वही खामोश रातें हैं।
आज बड़े अदब से सब खुद को नारीवादी कहते हैं,
कल वही हवस और अहंकार के किलों में रहते हैं।
आज तोहफों की बारिश है, फूलों का भी मेला है,
कल फिर “दुपट्टा संभालो”… यही पुराना रेला है।
हैरत है एक दिन में इतना सम्मान उमड़ आया,
बाकी दिन ये समाज क्यों यूँ चुपचाप खड़ा पाया।
क्या बरसों की बेरुखी का हिसाब आज पूरा है?
क्या एक दिन की इज़्ज़त से हर आंगण में नूरा है?
हमें नहीं चाहिए ये साल में एक दिन का दिखावा,
ये तो बस सोए ज़मीर को चुप कराने का छलावा।
अगर सच में कदर है तो हर लम्हे में दिखनी चाहिए,
सिर्फ आठ मार्च नहीं… हर रोज़ नारी की जीत होनी चाहिए।
@poeticanchor_ash
अश्विनी कुलकर्णी
09/03/2026


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