कल रात करवटें बदलते बीती…
एक बेचैनी, एक अधूरापन —
न जाने क्यों मन में छाया रहा।
ऐसा लगा जैसे कुछ छूट रहा हो,
या शायद कुछ समझ से परे हो रहा हो।
ना जाने क्यों ऐसा भी लगा —
कि गिले-शिकवे लेकर
किससे क्या कहूं…
कहाँ जाऊं?
लगता है —
कहीं ऐसा न हो कि
ज़िंदगी की किताब के कुछ पन्ने
मैं लिख ही न पाऊं।
जाने ये डर क्यों लगा —
कहीं ऐसा न हो
कि अधूरी रह जाए मेरी कहानी,
बिना किसी नाम, बिना किसी अंजाम के।
सोचती हूँ अक्सर…
ज़िंदगी का क्या भरोसा… कब क्या मोड़ ले ले!
आज जो साथ है,
कल वो बस एक याद बन सकता है।
तो कल रात…
मैं उलझी रही अपने ही सवालों में,
या शायद उन जवाबों में
जो कभी सुलझे ही नहीं थे।
तब से मन अशांत है…
जैसे दिल और दिमाग की जंग में
मैं हर रोज़ थोड़ी और फँसती जा रही हूँ।
एक ओर भावनाओं की नदी है,
दूसरी ओर तर्क की दीवारें —
और मैं…
बीच धार में खुद को
धीरे-धीरे बहते हुए महसूस करती हूँ।
अश्विनी कुलकर्णी
04/08/2025




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