राजेश खन्ना – एक अनछुआ एहसास

लेखिका: अश्विनी कुलकर्णी (01/09/2025)

राजेश खन्ना के आत्मचरित्र या उनकी निजी ज़िंदगी के बारे में तो बहुत कुछ लिखा गया है
लेकिन यहाँ मैं उनका नहीं, अपना अनुभव साझा करना चाहती हूँ।
एक ऐसा अनुभव जो मैंने महसूस किया… दिल से।
उनके गानों से वो जुड़ाव, जो मैंने शायद पहले कभी महसूस ही नहीं किया था।

इससे पहले कभी राजेश खन्ना के गानों को इतने क़रीब से महसूस नहीं किया था।

कई बार उनके गाने सुने थे…
कभी रेडियो पर चलते हुए, कभी टीवी पर किसी पुराने फ़िल्मी प्रोग्राम में झलकते हुए..
और कई बार तो खुद गुनगुनाते हुए उनके अंदाज़ में खो भी जाती थी।
लेकिन जब हाल ही में राजेश खन्ना पर आधारित एक संगीत संध्या की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू की,
तो एहसास हुआ कि अब तक मैं उनके गानों को सिर्फ सुना करती थी…
महसूस करना तो अब जाकर सीखा।

दिलचस्प बात ये है कि इससे पहले भी मैंने कई शो किए हैं … जिनमें ऐसे गाने प्रस्तुत किए गए जो राजेश खन्ना जी पर फिल्माए गए थे।
उनमें किशोर कुमार स्पेशल शो भी शामिल है, जिसमें कई सुपरहिट गाने काका पर ही आधारित थे।
लेकिन तब भी वो एहसास नहीं हुआ… वो गहराई, वो जुड़ाव, जो इस बार महसूस हुआ।
शायद फर्क सिर्फ सुनने और समझकर महसूस करने के बीच का था।

इस बार जब मैंने एक-एक गाने को लिखने से पहले बार-बार सुना,
हर शब्द को दिल से पकड़ने की कोशिश की
तो जैसे राजेश खन्ना परदे से निकलकर गीतों के ज़रिए सीधे दिल में उतर आए।

“जिंदगी एक सफर है सुहाना”, “कहीं दूर जब दिन ढल जाए”, या “जिन्दगी के सफ़र में गुज़र जाते हैं जो मकाम”
हर गीत में एक कहानी है, एक फ़लसफ़ा है, और सबसे बढ़कर
एक खामोश जादू है जो दिल पर सीधा असर करता है।

राजेश खन्ना सिर्फ एक एक्टर नहीं थे
वो एक एहसास थे, जो अपने अभिनय से संवाद नहीं, ख़ामोशी से भी दिल जीत लेते थे।

कई गीतकारों, संगीतकारों और प्लेबैक सिंगर्स की मेहनत और भावनाओं को ज़िंदा रूप देना राजेश खन्ना जी को बख़ूबी आता था।
वो न सिर्फ़ गानों को पर्दे पर निभाते थे, बल्कि उन्हें महसूस करके परदे पर उतारते थे।
उनके गाने सुनते समय ये भी महसूस होता है कि अगर यही गीत किसी और अभिनेता पर फिल्माए गए होते,
तो शायद उनमें वो असर न होता .

इस शो की तैयारी करते हुए ऐसा लगा जैसे मैं उनके साथ एक भावनात्मक यात्रा पर निकल पड़ी हूँ।
हर गाना एक नया मोड़ था, और हर मोड़ पर कुछ ऐसा था जो छू कर निकल जाता था।

अब जब उनपर फिल्माये गये गाने सुनती हूँ, तो बस सुनती नहीं महसूस करती हूँ।
और यही शायद उनके कला की सबसे बड़ी ताक़त है, कि सालों बाद भी वो हमारे दिलों में वैसे ही ज़िंदा हैं,
जैसे कभी किसी सिनेमा हॉल में स्क्रीन पर मुस्कराते हुए दिखते थे।

कहते हैं —
कुछ बातें… हम चाहकर भी दोबारा नहीं कह पाते।
कुछ लोग… लौटकर नहीं आते।
और वक़्त… बस यूँ ही गुज़र जाता है।

इस पल एक अहसास… एक श्रद्धांजलि…
पेश करती हूँ… दिल से… ध्यान से सुनियेगा।

उनकी आंखें बोलती थीं,
उनकी खामोशी भी दर्शकों के दिल चुरा लेती थी।
वो सिर्फ़ एक अभिनेता नहीं थे… एक एहसास थे,
हर फ्रेम में जैसे सजीव इतिहास थे।

आज भी दिल कहता है —
परदे से पुकार के…
“वो राजेश खन्ना थे यारों… कुछ खास थे।”

वो वक़्त के साथ खो तो गए… सदा के लिए,
पर एक बात कहूं…
जो दिल में बस जाएं — वो फिर नहीं आते।

हमारा आज और उनका कल

हम 90s के बाद की पीढ़ी हैं… हमने राजेश खन्ना को बड़े पर्दे पर नहीं देखा।
हमने उन्हें टीवी पर, यूट्यूब पर या फिर पुराने कैसेट्स और डीवीडी में ही जाना।

पर हर बार जब उनकी कोई फिल्म देखती हूँ, तो मन में एक सवाल बार-बार उठता है ।

क्या एहसास रहा होगा उस दौर के लोगों के लिए ?
हमारे मम्मी-पापा, नाना-नानी, दादी-दादा जैसे लोगों के लिए?
जब उन्होंने “राजेश खन्ना” को सिनेमा हॉल में, बड़े पर्दे पर, पहली बार देखा होगा?

जब उनकी स्क्रीन एंट्री होती होगी… धीमी मुस्कान, सधा हुआ संवाद, आँखों में गहराई, और वो खास स्टाइल…
तो क्या हॉल की हर सीट पर दिल तेज़ नहीं धड़कते होंगे?

शायद उस दौर की लड़कियाँ उनकी एक झलक पर मुस्कुरा देती होंगी,
और लड़के उनके अंदाज़ को अपनाने की कोशिश करते होंगे।

उनका “Pushpa… I hate tears” हो या “बाबूमोशाय… ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए
हर डायलॉग पर तालियाँ बजती होंगी, सीटियाँ बजती होंगी, और पूरा थिएटर झूम उठता होगा।

कभी-कभी लगता है, हमसे पहली पीढ़ी के लोग कितने भाग्यशाली रहे जिन्होंने “काका” को उस रूप में जिया, जो सिर्फ बड़े पर्दे पर ही पूरी तरह जीवंत था।

हमने तो उन्हें रिकॉर्ड किए हुए लम्हों में ही महसूस किया है.. लेकिन आज भी उनका असर वैसा ही है…
वक्त बदल गया, स्क्रीन बदल गई ….. पर एहसास नहीं बदला।

राजेश खन्ना — एक नाम नहीं, एक युग है।
जिसे जितना समझो, उतना और गहराता चला जाता है।
और अब जब भी उनका कोई गाना सुनती हूँ…
तो दिल कह उठता है —
कुछ तो लोग कहेंगेलोगों का काम है कहना…”
पर जो दिल से जुड़े, उनके बारे में कहना तो बनता है।

धन्यवाद

2 responses to “राजेश खन्ना – एक अनछुआ एहसास”

  1. SANJEEV GOPAL BHOKARIKAR Avatar
    SANJEEV GOPAL BHOKARIKAR

    आपने, बहुत ही सही ढंगमे, भारतके पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना के बारे मे लिखा है.

    उनकी सबसे अच्छी फिल्म “आनंद” ही थी, ऐसा मेरा भी मानना है.

    जैसे आपने आपके लेख मे लिखा है ” जिंदगी बडी होनी चाहिए-लंबी नही” बस्स राजेश खन्ना का दौर चंद बरसोंकाही रहा होगा, परंतु वो दौर एक तूफान की तरह था, बेशक.

    70के दशकमे, एक के बाद एक अंतरालमे ,पंधरा फिल्मे सुपर हिट देनेवाला नायक, राजेश खन्नाके पहेले न था, न उनके बाद कोई नायकने वैसी सफलता दिखाई है.

    आपके लेख के लिए धन्यवाद

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    1. Ashwini Kulkarni Avatar

      आपके शब्द पढ़कर दिल खुश हो गया 🙏

      Yes, you are absolutely right Anand was indeed his best and most soulful film.

      वो दौर सच में तूफान की तरह आया और चला गया, लेकिन आज भी हर दिल पर राज करता है।

      Thank you so much for appreciating my blog, it really means a lot 😇😊

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