लेखिका: अश्विनी कुलकर्णी
यादों का वो सूटकेस बरसों बाद खुल गया,
मायके का वो कोना यादों से मिल गया।
पंद्रह सालों तक जो दफ़न था लिफाफे में,
वो एक खत… जो कभी भेजा नहीं गया।
“क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि बरसों पुरानी किसी अलमारी के कोने से आपको अपनी ही जिंदगी का कोई खोया हुआ हिस्सा मिल जाए? यह कहानी है एक पुराने वीआईपी सूटकेस, कॉलेज की यादों, सोनू निगम के गानों और एक ऐसे खत की, जिसे मंज़िल तक पहुँचने में १५ साल लग गए। एक अहसास जो दोस्ती और मोहब्बत की सरहदों के बीच कहीं ठहर गया था।”
काफी सालों बाद मायके आना हुआ। घर की दीवारें वही थीं, लेकिन उनमें बसी खुशबू अब थोड़ी बदल गई थी। माँ ने काम के बीच टोकते हुए कहा, “बड़ी मुश्किल से समय निकालकर आई हो, तो जरा अपनी अलमारी देख लो। उसमें तुम्हारा काफी पुराना सामान पड़ा है। कल कबाड़ीवाले को बुलाया है, सोचा अनचाहा सामान दे दूँ तो जगह खाली हो जाए।”
सुनकर मन में थोड़ी टीस उठी। “अनचाहा सामान”… क्या वाकई वह सामान अब मेरे लिए मायने नहीं रखता? फिर सोचा, घरवाले भी आखिर क्या करेंगे उस सामान का जिसका मुझे खुद ही सालों से ख्याल नहीं आया।
अलमारी के पास पहुँचते ही एक अजीब सी हिचकिचाहट हुई। धीरे से मैंने वह पुराना, धूल खाया नीले रंग का VIP सूटकेस बाहर निकाला। यह सिर्फ एक सूटकेस नहीं था, उस दौर का एक ‘लॉकर’ था, जिसमें घर के सारे जरूरी कागजात और कीमती चीजें महफूज रखी जाती थीं। इसे हाथ लगाते ही लगा जैसे वक्त ठहर गया हो।
सूटकेस को जैसे ही खोला, यादों का एक जबरदस्त झोंका आँखों के सामने से गुजर गया। एक-एक करके मैंने सामान टटोलना शुरू किया और हर चीज के साथ वो सारी यादें बाहर आती गयीं। सबसे पहले हाथ में पुराने स्कूल सर्टिफिकेट्स आए। फिर कम्पास बॉक्स मिला। उसे खोलते ही उसमें रखे पुराने हो चुके पेन, पेंसिल, एक घिसा हुआ रबर और टूटी हुई स्केल दिखाई दी। ये सिर्फ़ स्टेशनरी नहीं थी, क्लास में होने वाली वो छोटी-छोटी लड़ाइयां और दोस्ती की यादें थीं।
कुछ धूल भरे ग्रीटिंग कार्ड्स भी थे। उन्हें हाथ में लेते ही चमकीले पेन से लिखा “Happy Birthday” जैसे आज भी चमक रहा हो। ये वो कार्ड्स थे जो सहेलियाँ जन्मदिन पर कितने प्यार से देती थीं।
फिर हाथ लगा मेरा वह वॉकमेन। पापा ने मेरे 13वें जन्मदिन पर इसे दिलवाया था। उस वक्त वॉकमेन पर गाने सुनना सबसे बड़ा सुकून था। लीजा रे और आफताब शिवदासानी की फिल्म ‘कसूर’, ‘मोहब्बतें’ और सोनू निगम की वह एल्बम ‘दीवाना’—उस सूटकेस में आज भी वह सारी कैसेट्स वहीं मौजूद थीं। कैसेट्स की रील को पेंसिल से घुमाना और गानों के बोलों को अपनी डायरी में उतारना मेरा पसंदीदा काम था।
जैसे ही मैंने वह पुरानी डायरी उठाई, तो देखा कि वह डायरी मेरी नहीं थी। अंदर एक फोटो थी, कॉलेज के आखिरी दिन की। उसमें मैं और वह साथ थे… शायद हमारी इकलौती तस्वीर। वक्त के साथ उसका रंग उड़ चुका था और दाईं तरफ ऊपर से वह फोटो खराब हो गई थी।
पन्ने पलटते हुए बीच से सरकता हुआ एक लिफाफा नीचे फर्श पर गिर पड़ा। लिफाफे पर किसी का नाम नहीं था। मैंने उसे खोला तो देखा वह एक खत था। हैंडराइटिंग बड़ी गन्दी थी… देखते ही मैं समझ गई, यह उसी की लिखावट है। शायद कॉलेज के आखिरी दिन वह डायरी गलती से मेरे बैग में आ गई थी और 15 सालों तक इस सूटकेस में दफन रही।
मैंने दिल थामकर उसे पढ़ना शुरू किया, लिखा था कि:
“लिखना मेरी फितरत नहीं है, और शायद यह मेरी गन्दी हैंडराइटिंग देखकर तुम्हें समझ आ ही गया होगा। पर कल कॉलेज का आखिरी दिन है, तो लग रहा है कि आज नहीं लिखा, तो यह बोझ उम्र भर साथ चलेगा।
पता नहीं तुम मुझे किस नजर से देखती हो, पर मेरे लिए तुम इस शोर-शराबे वाले कॉलेज में सुकून का वह कोना थी, जहाँ मैं बस चुपचाप बैठना चाहता था। तुम जब लाइब्रेरी की उस खिड़की के पास बैठकर धूप की रोशनी में अपनी डायरी में कुछ लिखती थी, तो तुम्हारे चेहरे पर आने वाली वो लकीरें किसी कविता जैसी लगती थीं। तुम्हारा वो बातों-बातों में अपनी जुल्फों को कान के पीछे हटाना… शायद तुम्हें अंदाजा भी नहीं कि उस एक पल के लिए मैं घंटों कैंटीन में तुम्हारा इंतजार कर सकता था।
कितनी ही बार जब तुम अपनी धुन में मुस्कुराती थी, मेरा जी चाहता था कि तुमसे कहूँ—‘क्या तुम्हारी इस खूबसूरत दुनिया में मेरे लिए भी कोई छोटी सी जगह है?’ पर मैं डरता था। हमारी दोस्ती की यह जो पतली सी लकीर है, मैं उसे पार करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। मुझे लगा कि अगर मैंने यह कह दिया कि मैं तुम्हें पसंद करता हूँ, तो शायद तुम्हारा वह बेबाक हंसना, वह छोटी-छोटी बातों पर मुझसे हक से लड़ना और वह मासूम भरोसा, सब एक पल में खत्म हो जाएगा। मैं तुम्हें पाने की चाहत में, तुम्हें खोना नहीं चाहता था।
अब वो पल है जब सब विदा हो रहे हैं, मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि कॉलेज की मेरी सबसे खूबसूरत याद सिर्फ तुम हो। वह पल जब तुम कॉरिडोर से अपनी सहेलियों के साथ हंसती हुई गुजरती थी, तो कसम से, मेरी दुनिया ठहर जाती थी। तुम्हारी सादगी ही तुम्हारी सबसे बड़ी तारीफ है। मुझे डर है कि अगर मैंने ये लफ्ज आज कह दिए, तो यह दोस्ती का खूबसूरत पर्दा गिर जाएगा। इसलिए मैं इन जज्बातों को इसी कागज पर दफन कर रहा हूँ।”
खत खत्म हुआ और मेरी आँखों से एक आंसू ठीक उसी जगह गिरा जहाँ उस फोटो का रंग उड़ा हुआ था। पंद्रह साल… उसे पता भी नहीं था कि मैं भी उसके लिए बिल्कुल यही महसूस करती थी। पर कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते, और यह जो दोस्ती से परे कुछ था, वह अब सिर्फ एक अहसास बनकर रह गया था।
पर आज इस पुराने सूटकेस के पास बैठकर दिल को एक अजीब सा सुकून मिला कि वह मोहब्बत एकतरफा नहीं थी। वह भी मेरी ही तरह खामोश था, मेरी ही तरह डरता था। पंद्रह साल बीत गए, मैं अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई हूँ और वह भी यकीनन अपनी दुनिया में कहीं व्यस्त होगा। जैसे मेरे दिल के किसी कोने में आज भी उसका ख्याल महफूज है, यकीनन उसके दिल में भी मेरा अक्स कहीं न कहीं जिंदा होगा।
कल कबाड़ीवाला आएगा और बहुत कुछ ले जाएगा, लेकिन यह डायरी और वह खत अब कभी उस सूटकेस में वापस नहीं जाएंगे। यह ‘अनचाहा सामान’ नहीं, बल्कि मेरी जिंदगी का वह सबसे खूबसूरत सच है जो इतने सालों बाद आज मुझे मुकम्मल कर गया।





Leave a comment