सुनो… कुछ लिखा है तुम्हारे लिए… पढ़ोगे क्या?
इन लफ़्ज़ों में छुपी मेरी खामोशी समझोगे क्या…?
हर शब्द में तुम्हारा ही एहसास बसा है,
जो दिल ने कभी कहा नहीं… वो महसूस करोगे क्या?
और अगर मैं ही पढ़कर सुनाऊँ अपना लिखा,
तो मेरी आवाज़ की हल्की-सी लरज़िश महसूस कर पाओगे क्या…?
कभी शब्दों से, कभी नज़रों से बात करती हूँ मैं,
जो कह न पाऊँ खुलकर… उसे समझ पाओगे क्या?
सुनो… अगर कभी मैं लफ़्ज़ों में बिखर जाऊँ,
या खामोशी में कहीं टूट जाऊँ-
तो उन बिखरे टुकड़ों को
अपनी खामोशी में समेट पाओगे क्या?
और अगर मैं चुप हो जाऊँ… बिल्कुल बेआवाज़,
तो मेरी खामोशी को अपना नाम दे पाओगे क्या…?
बस इतनी-सी ख़्वाहिश है इस दिल की;
जब मैं ना रहूँ कहने को कुछ भी,
तब भी मेरी हर अधूरी बात में
तुम खुद को ढूँढ पाओगे क्या…?





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